Wednesday, March 4, 2009

कभी अलविदा न कहना

यह पल है कितना सुहाना,
इस पल में है डूब जाना ।
इन लम्हों को बारिश की तरह छूलूं
इस वक्त को पैमाना बनाकर पीलूँ।
इनको तो एक दिन यादें है बन जाना।

मैं वो पुलिंदा ले जा रहा हूँ, यादों से भरा।
मुठी से फिसले रेत है, थाम हौले से ज़रा।
पल पल चड़ता सूरज नया सवेरा लाता है,
रात की मीठी चांदनी को चुरा कर ले जाता है ।

इस पल ने हमको वो दिया जो न हमने सोचा था,
रिश्तों के कच्चे धागों में गांठे का धोखा था।
कुछ पल चले थामे हाथ, वोह याद तो हमेशा आएगी,
आँखों से छलकता पानी, और होठों पे मुस्कान लाएगी।

दोस्तों के साथ बिताये हुए दिन, वापस आने को तरसायंगे,
सामने जाती गली से गुज़रे तो कदम अपने आप रुक जायेंगे ।
अब हर महफिल का पैमाना, कुछ फीका फीका होगा,
क्या टकराएँ प्यालों को हम, हमने क्या जीता होगा ।

इस शिक्षा के मन्दिर मैं, हम पुजारी की हँसी उडाते हैं,
सर पर रखे हाथ जो वो हमारे, दिल से दुआंए दे जाते है ।
हम आगे पद चिन्ह को देख कर, कदम अपने बढाते है,
एक बार पीछे देख ले, हर कदम फूल बनकर दुनिया महकाते हैं।

मैं बस येही दुआं करता हूँ, ओड़े तू मेरी यादों का गहना,
हँसे तू, खिलखिलाए तू, पर मुझसे कभी अलविदा न कहना.

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